विकास पाण्डेय की दो कविताएँ
इन दोनों कविताओं में जीवन, प्रतीक्षा, आत्मसंघर्ष और चेतना की जटिल यात्रा उभरती है। पहली कविता अनन्त प्रतीक्षा और अस्तित्व की क्षीणता को नदी, बर्फ और दीप के बिम्बों में देखती है; दूसरी आत्ममंथन, मलिनताओं, क्षुद्रताओं और साधना के बीच मनुष्य के भीतर घटते आध्यात्मिक द्वंद्व को स्वर देती है।